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रावण ने मरने से पहले क्या कहा था, जो हर किसी को जरूर जानना चाहिए

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AR news live : रावण भले ही एक राक्षस कुल का राजा था. लेकिन उसके जैसा दुनिया में दूसरा कोई व्यक्ति नहीं. इसलिए कहा जाता है कि रावण सिर्फ एक है. लंकाधिपति दशानन महाराज रावण अत्यंत ही बलशाली, महापराक्रमी योद्धा, परम शिव भक्त, वेदों का ज्ञाता और महापंडित था.

 

रावण की विशेषताएं

 

जैन शास्त्र में रावण को प्रति-नारायण माना गया है. यही कारण है कि जैन धर्म के 64 शलाका पुरुषों में रावण का नाम भी शामिल है. रावण ब्रह्मा ज्ञानी और बहु-विद्याओं का जानकार था. वह कई तरह के तंत्र, सम्मोहन, इंद्रजाल और जादू जानता था. रावण के पास ऐसा विमान भी था, जो अन्य किसी के पास नहीं था. इसलिए जब रावण मृत्युशैय्या पर पड़ा होता है तब भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण को रावण ने राजनीति और शक्ति का ज्ञान प्राप्त करने को कहते हैं.

 

 

क्यों भगवान श्री राम ने लक्ष्मण जी को रावण से शिक्षा लेने को कहा

 

जब राम और रावण के बीच युद्ध हुआ तो रावण की हार हुई. रावण मरणासन्न अवस्था में था. तब भगवान राम से लक्ष्मण को रावण ने शिक्षा लेने को कहा. क्योंकि राम भी जानते थे कि रावण इस संसार के नीति, राजनीति और शक्ति के महान पंडित थे. इसलिए राम ने लक्ष्मण से कहा कि तुम रावण के पास जाओ को उससे जीवन से जुड़ी ऐसी शिक्षाएं प्राप्त करो, जो तुम्हें और कोई नहीं दे सकता है. भगवान राम की बात सुनकर लक्ष्मण मृत्युशैय्या पर पड़े रावण के सिर के पास जाकर खड़े हो गए.

 

लेकिन लक्ष्मण के काफी देर खड़े होने पर भी रावण ने कुछ नहीं कहा. लक्ष्मण राम के पास वापस आ गए और कहा कि प्रभु! मैं बहुत देर तक रावण के पास खड़ा रहा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा. तब भगवान राम बोले कि, किसी से ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसके सिर नहीं बल्कि चरणों के पास खड़ा होना चाहिए. इसके बाद लक्ष्मण फिर से रावण के चरणों के पास जाकर खड़े हो गए और रावण ने मरने से पहले लक्ष्मण को जो बातें बताई, वह आज भी हर किसी को जरूर जाननी चाहिए.

 

रावण ने मरने से पहले क्या कहा?

 

रावण लक्ष्मण को ज्ञान देते हुए कहते हैं कि किसी भी शुभ या अच्छे काम के लिए देरी नहीं करनी चाहिए. वहीं अशुभ काम के लिए जितना मोह वश करना पड़े उसे उतना टालने का प्रयास करना चाहिए.

अपनी शक्ति और पराक्रम में इतना घमंड नहीं करना चाहिए या इतना अधिक अंधा नहीं होना चाहिए कि शत्रु तुच्छ लगने लगे. मुझे ब्रह्मा जी से वरदान मिला था कि मानव और वानर के अलावा कोई मुझे नहीं मार सकेगा. लेकिन इसके बावजूद मैंने इन्हें तुच्छ मान लिया और यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी, जिस कारण आज मैं मरणासन्न अवस्था में पड़ा हूं.

रावण का तीसरा उपदेश था कि, अपने शत्रु और मित्र के बीच पहचान करने की समझ होनी चाहिए. कई बार हम शत्रु को अपना मित्र समझ लेते हैं, जोकि बाद में हमारे शत्रु साबित होते हैं. वहीं जिसे हम शत्रु समझकर पराया कर देते हैं वही हमारे असली मित्र होते हैं.

रावण ने लक्ष्मण को ज्ञान देते हुए कहा कि, अपने जीवन के गूढ़ रहस्यों के बारे में किसी को भी नहीं बताना चाहिए. फिर चाहे वह आपका कितना भी सगा क्यों न हो. क्योंकि विभीषण जब लंका में था तब वह मेरा शुभेच्छु था और जब वह राम की शरण में गया तो मेरे ही विनाश का कारण बन गया.

रावण का आखिरी उपदेश था कि, किसी भी पराई स्त्री पर बुरी नजर नहीं रखनी चाहिए. क्योंकि जो व्यक्ति पराई स्त्री पर बुरी नजर रखता है वह नष्ट हो जाता है.

 


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