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Sanskar: जातकर्म संस्कार से बनता है नवजात बच्चा बलवान, जानें महत्व और इसकी विधि

Sanskar: 16 संस्कार में चौथा जातकर्म संस्कार होता है. गर्भस्थ बालक के जन्म होने पर यह संस्कार किया जाता है. शास्त्रों में कहा गया है ‘जाते जातक्रिया भवेत्’ अर्थात गर्भ से पैदा होने के बाद शिशु की शुद्धि के लिए पहली बार जो कार्य किए जाते हैं उन सभी को जातकर्म कहा जाता है. आइए जानते हैं शिशु के पैदा होने के बाद जातकर्म संस्कार क्यों जरुरी है, इसका महत्व और विधि.
जातकर्म संस्कार महत्व
- नौ माह तक शिशु मां के गर्म में पलता है और फिर जैसे ही उसका जन्म होता है तब उसके शरीर की शुद्धता के लिए जातकर्म संस्कार किया जाता है. इसमें बच्चे को नहलाना, शहद और घी चटाना, आयुप्यकरण और स्तनपान कराया जाता है.
- जातकर्म संस्कार कर शिशु के उन दोषों को दूर किया जाता है जो उसे माता के गर्म में मिले जैसे सुवर्ण वास्तुदोष, रक्त दोष, रसपान दोष आदि.
- जन्म के बाद संतान का पहली बार बाहरी वातावरण से सामना होता है, ऐसे जातकर्म संस्कार से बच्चे को संक्रमण से बचाया जाता है, जिससे उससे बाहरी दुनिया में रहने की शक्ति मिलती है.
- जातकर्म संस्कार की विधि
- जातकर्म संस्कार में शिशु को सोने की श्लाका या अंगुली से घी और शहद चटाया जाता है. ये उसके लिए औषधि का काम करता है. गर्भ में शिशु का मुंह बंद रहता है इस क्रिया के जरिए उसके मुंह से गंदगी साफ की जाती है. इसके बाद माता अपने शिशु को स्तनपान कराती है जो उसे अमरत्व प्रदान करता है.
- शिशु के तालुओं पर घी लगाते हैं ताकि उसका पोषण अच्छे से हो. ये उसके शरीर, बुद्धि, आंखों की रोशनी, वीर्य आदि में वृद्धि करने का काम करता है.
- अब चने के बारीक आटे से उसे उबटन लगाकर नहलाया जाता है ताकि शरीर को शुद्ध कर सकें. इसके बाद बालक के पिता पवित्र नदी में स्नान कर कुल देवता और बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं.




